Cyber Crime Podcast ft Dr Pavan Duggal

Cyber War के दौर में आपकी सुरक्षा: Dr Pavan Duggal के साथ खास बातचीत

नमस्कार दोस्तों! हाल ही में मेरे पॉडकास्ट में एक ऐसे शख्स का स्वागत हुआ जो cyber crime and law के क्षेत्र में दो दशकों से ज्यादा समय से काम कर रहे हैं – सुप्रीम कोर्ट के लॉयर और cyber law के expert Dr. Pavan Duggal। उनके साथ हुई बातचीत ने मेरी आंखें खोल दीं। आज मैं आपको उसी बातचीत के जरिए बताना चाहता हूं कि कैसे साइबर क्राइम, एआई और डीपफेक ने हमारी जिंदगी को प्रभावित किया है और कैसे हम खुद को बचा सकते हैं।

साइबर वॉर का दौर

दोस्तों, जब मैंने डॉ. दुग्गल से बातचीत शुरू की, तो उन्होंने सबसे पहले एक बात कही जो मेरे दिमाग में बैठ गई –

“आज का दौर सिर्फ साइबर क्राइम का नहीं रह गया है, बल्कि यह साइबर वॉर का दौर हो चुका है।”

एआई, डीपफेक, डार्कनेट और साइबर क्राइम अब सिर्फ फिल्मी बातें नहीं रह गए हैं, बल्कि ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।

उन्होंने बताया कि सबसे खतरनाक बात ये है कि जो लोग खुद को पढ़ा-लिखा और तेज़-तर्रार समझते हैं, वो भी इन जालों में फंस रहे हैं। उन्होंने एक ओटीटी सीरीज़ “जामतारा” की लाइन याद दिलाई – “सबका नंबर आएगा।” उनका कहना था कि यह सच है। अगर आपका नंबर अभी तक नहीं आया है, तो इसकी सिर्फ एक वजह है कि अभी आपकी बारी नहीं आई है। और इससे बचने का एक ही रास्ता है – सही जानकारी

बेंगलुरु की महिला और ₹45 लाख का डीपफेक स्कैम

मैंने डॉ. दुग्गल से हालिया साइबर क्राइम के कुछ उदाहरण मांगे। उन्होंने सबसे पहला मामला बेंगलुरु की एक महिला का बताया। उस महिला को उसकी सोशल मीडिया फीड में एक वीडियो दिखा। वीडियो में भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी लोगों से अपील कर रही थीं कि केंद्र सरकार ने एक नई योजना बनाई है, जिसमें पैसा लगाने से एक साल में तीन गुना रिटर्न मिलेगा।

डॉ. दुग्गल ने बताया – “उस महिला ने बिना किसी शक के वीडियो पर भरोसा कर लिया। उसने पहले थोड़े पैसे लगाए, फिर लालच में आकर कुल ₹45 लाख लगा दिए। जब पैसे निकालने की बारी आई, तो पता चला कि न तो ऐसी कोई योजना है, न ही सरकार ने ऐसा कुछ किया। ध्यान से देखने पर पता चला कि वो वीडियो असली नहीं था, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा बनाया गया डीपफेक था।”

उन्होंने कहा कि यह घटना बताती है कि हम भारतीय “विश्वासी” हैं – जो देखते हैं, उस पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं। हम सवाल पूछना ही भूल गए हैं। आज हर साइबर क्राइम में एआई का तड़का लगने लगा है। साइबर क्रिमिनल्स ने समझ लिया है कि एआई उन्हें लोगों को गुमराह करने के नए-नए रास्ते बता रहा है।

76 साल की बुजुर्ग महिला और डिजिटल अरेस्ट का डर

फिर उन्होंने एक और हैरान कर देने वाला मामला सुनाया – दिल्ली के पास एक फार्म हाउस में रहने वाली 76 साल की बुजुर्ग महिला, जो अकेली रहती थीं। उनके दोनों बच्चे बाहर रहते थे। डॉ. दुग्गल ने बताया – “उन्हें एक फोन आया। वीडियो ऑन करने को कहा गया। वीडियो ऑन करते ही उन्होंने देखा कि सामने पुलिस अधिकारी की वर्दी में एक शख्स है। उसने कहा कि नया कानून आया है और उन्होंने कोई गड़बड़ की है, इसलिए उन्हें ‘डिजिटली अरेस्ट’ किया जा रहा है।”

महिला ने कहा – “मैंने दिल्ली पुलिस के एडवरटाइजमेंट सुने हैं। डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई चीज नहीं होती। आप मुझे बेवकूफ बना रहे हो।” जब उन्होंने फोन रखने की बात कही, तो सामने वाले ने धमकी दी – “रुको! हमने तुम्हारे फार्म हाउस के चारों ओर शार्प शूटर्स रखे हैं। तुम अकेली हो, तुम्हारे यहां तीन नौकर हैं। ज्यादा हरकत की तो गोली से उड़ा देंगे।”

डॉ. दुग्गल ने बताया – “अब महिला को आभास हुआ कि उनकी जान खतरे में है। उन्होंने डर के मारे पूछा – ‘क्या करना है?’ ठगों ने पहले खाते में जमा पैसे ट्रांसफर करवाए, फिर एफडी तुड़वाकर पैसे मंगवाए। चार दिनों में ये ठग उनसे तीन करोड़ रुपए ऐंठ ले गए। जब महिला के पास कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने कहा – ‘अब मार ही दो मुझे।’ फोन डिस्कनेक्ट हुआ। असलियत में न कोई शार्प शूटर था, न कोई पुलिस। सिर्फ डर के सहारे उन्हें लूट लिया गया।”

उन्होंने कहा कि कोविड-19 के बाद से हमारे जीवन में डर और पैनिक दो चीजें स्थायी रूप से घर कर गई हैं। हम जल्दी डरते हैं, जल्दी पैनिक हो जाते हैं, और शॉर्टकट ढूंढते हैं। यहीं हम गलती कर बैठते हैं।

रिटायर्ड CEO और ₹9 करोड़ का टेलीग्राम स्कैम

डॉ. दुग्गल ने एक और मामला सुनाया – 72 साल के रिटायर्ड CEO, जो बड़ी-बड़ी कंपनियों के हेड रह चुके थे। उन्हें एक टेलीग्राम ग्रुप जॉइन करने का मैसेज आया। ग्रुप में सभी सदस्य एक नई इन्वेस्टमेंट स्कीम की तारीफ कर रहे थे। स्कीम थी – हर हफ्ते 15% रिटर्न। यानी ₹100 लगाओ, एक हफ्ते में ₹115 वापस।

मैंने हैरानी से पूछा – “15% वीकली? ये तो टू गुड टू बी ट्रू है!” डॉ. दुग्गल ने कहा – “बिल्कुल। उन्होंने भी यही सोचा। लेकिन इतने लोग तारीफ कर रहे थे, तो उन्होंने ₹5000 लगाकर देखा। एक हफ्ते में रिटर्न मिल गया। फिर ₹5000 और लगाए – रिटर्न मिला। फिर ₹5 लाख लगाए – रिटर्न मिला। फिर ₹50 लाख लगाए – रिटर्न मिला। अब वो कन्विंस हो गए कि यही सबसे बेहतरीन इन्वेस्टमेंट है। उन्होंने सारी एफडी तोड़ीं, म्यूचुअल फंड बेचे और कुल ₹9 करोड़ उस स्कीम में लगा दिए।”

उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पैसे वापस निकालने चाहे, तो ठगों ने कहा – “₹9 करोड़ निकालने के लिए पहले ₹4.5 करोड़ और जमा कराओ।” तब उन्हें आभास हुआ कि उनके साथ धोखा हुआ है। डॉ. दुग्गल ने कहा – “ये सब हुआ एक छोटे से लालच में। 8% ब्याज वाली एफडी छोड़कर 15% वीकली रिटर्न के चक्कर में वो फंस गए।”

उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही –

“अगर कोई चीज ‘टू गुड टू बी ट्रू’ लगे, तो समझ जाइए कि कहीं न कहीं गड़बड़ है। जितनी जल्दी निकलें, उतना अच्छा।”

साइबर क्रिमिनल्स कौन होते हैं?

मैंने डॉ. दुग्गल से पूछा – “ये लोग इतने शातिर कैसे होते हैं? क्या ये भी एआई का इस्तेमाल करते हैं?” उन्होंने बताया – “ये जो लोग साइबर क्राइम करते हैं, ये बहुत पढ़े-लिखे नहीं होते, लेकिन शातिर होते हैं। इनका दिमाग बहुत तेज होता है। ये टेक्नोलॉजी को अच्छे से जानते हैं और लोगों के दिमाग को पढ़ना जानते हैं। पहले ये आपका कॉन्फिडेंस जीतते हैं, फिर भ्रमित करते हैं, फिर डर में डालते हैं और आखिर में जेब से पैसे निकाल लेते हैं।”

फिर उन्होंने एक हैरान कर देने वाला किस्सा सुनाया। एक कॉन्फ्रेंस में उनकी मुलाकात एक शख्स से हुई। उस शख्स ने कहा – “हम साइबर क्राइम का बिजनेस करते हैं।” डॉ. दुग्गल ने पूछा – “मतलब साइबर क्राइम से लड़ने में मदद करते हो?” उसने कहा – “नहीं सर, हम साइबर क्राइम करते हैं।” डॉ. दुग्गल ने बताया – “छह लोगों की टीम थी, सब एआई टूल्स इस्तेमाल करते थे, और एक महीने में 30-35 करोड़ रुपए कमाते थे। इतना कॉन्फिडेंस कि पुलिस पकड़े तो पकड़े। वो कॉन्फ्रेंस में लेटेस्ट कॉरपोरेट ट्रेंड्स जानने आए थे ताकि अपनी स्ट्रैटेजी और बेहतर कर सकें।”

उन्होंने कहा – “हम डिजिटल कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े हैं। चारों तरफ से हम पर अटैक हो सकता है। अगर हम सतर्क नहीं रहे, तो ये लुटारे हमें लूट लेंगे। इसलिए थोड़ा सेल्फिश हो जाइए – अपनी सुरक्षा खुद कीजिए।”

डेटा: सबसे बड़ा हथियार

डॉ. दुग्गल ने डेटा को लेकर एक बहुत ही रोचक शब्द इस्तेमाल किया – “द ग्रेट इंडियन डेटा वोमिटिंग रेवोल्यूशन।” उन्होंने बताया कि हम लोग अपना पर्सनल, प्रोफेशनल और सोशल डेटा इंटरनेट पर उगल रहे हैं। इस डेटा का इस्तेमाल करके लोग हमें टारगेट कर सकते हैं।

उन्होंने एक कपल का उदाहरण दिया जो कोविड-19 के दौरान मनाली घूमने गया। उन्होंने सोशल मीडिया पर हर जगह की तस्वीरें और वीडियो पोस्ट किए – बिना डेटा स्क्रब किए, बिना मेटाडेटा हटाए। आठ दिन बाद जब घर लौटे, तो पूरा घर साफ हो चुका था। चोरों को पता था कि वो इस वक्त कहां हैं, कब तक नहीं आएंगे। उनके डेटा ने ही चोरों को एडवांस नोटिस दे दिया था।

डॉ. दुग्गल ने कहा – “आज डेटा पैसों से भी ज्यादा कीमती है। अपने डेटा को संभालकर रखिए, कम से कम शेयर कीजिए।”

आधार कार्ड की फोटोकॉपी का खतरा

उन्होंने आधार कार्ड को लेकर भी एक अहम बात बताई। बहुत लोग बैंकों में आधार कार्ड की फोटोकॉपी देने की जल्दी करते हैं। डॉ. दुग्गल ने कहा – “सोचिए – आप फोटोकॉपी की दुकान पर जाते हैं। दुकानदार पहली कॉपी निकालता है, कहता है – ‘साहब ठीक नहीं आई, रुको अच्छी करके देता हूं।’ वो आपको अच्छी कॉपी तो दे देता है, लेकिन पहली वाली कॉपी अपने पास रख लेता है। उस एक कॉपी की 500 कॉपियां बनती हैं और साइबर क्रिमिनल्स को बेची जाती हैं। वो आपके आधार का दुरुपयोग करते हैं और कानूनी नतीजे आपको भुगतने पड़ते हैं।”

उन्होंने सलाह दी कि आधार की फोटोकॉपी देते वक्त बहुत सावधान रहें।

फोन की परमिशन और प्राइवेसी

हमने फोन की परमिशन और प्राइवेसी पर भी बात की। डॉ. दुग्गल ने बताया – “हम जब भी कोई ऐप डाउनलोड करते हैं, तो बिना सोचे-समझे सारी परमिशन दे देते हैं। मैं एक उदाहरण देता हूं – एंड्रॉयड में टॉर्च ऐप होता है। वो आपसे परमिशन मांगता है – कॉन्टैक्ट्स की, फोटो की। टॉर्च ऐप को आपके कॉन्टैक्ट्स से क्या मतलब? बिल्कुल नहीं। फिर भी हम दे देते हैं।”

उन्होंने कहा कि हमारा फोन एक चलता-फिरता टाइम बम है। ये हमारी हर बात सुन रहा है। उन्होंने पूछा – “आपने कभी नोटिस किया है – आप किसी चीज के बारे में बात करते हैं, और थोड़ी देर बाद उसी तरह के ऐड आने लगते हैं? ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है। फोन हर समय हमें सुन रहा है।

डॉ. दुग्गल ने एक चौंकाने वाला तथ्य बताया – हमारा कैमरा और माइक्रोफोन हमारे कंट्रोल में नहीं है। इन्हें रिमोटली ऑन किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने सलाह दी –

“अगर कोई कॉन्फिडेंशियल बात करनी है, तो फोन को कमरे से बाहर रखिए या 12 फीट की दूरी पर रखिए, ताकि वो आपकी आवाज न सुन सके।”

AI: राक्षस बनता स्वामी

जब हमने एआई पर बात की, तो डॉ. दुग्गल ने कई चिंताजनक मामले सुनाए। उन्होंने बताया कि लोग एआई चैटबॉट्स से वो बातें कर रहे हैं जो वो अपने जीवनसाथी से भी नहीं करते। उन्हें लगता है कि ये प्राइवेट है। लेकिन सच ये है कि एआई एक डेटा हंग्री डीमन है। एक बार आपने डेटा दे दिया, तो वो कभी नहीं भूलता।

उन्होंने मध्य भारत का एक मामला सुनाया – 11वीं का छात्र, जिसकी त्वचा थोड़ी काली थी। स्कूल में बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे। एक एक्सीडेंट के बाद और चोटें आ गईं, मजाक और बढ़ गया। परेशान होकर वो एआई चैटबॉट के पास गया। डॉ. दुग्गल ने बताया – “एआई ने उसकी सारी बात सुनी और निष्कर्ष दिया कि उसे अपनी जान ले लेनी चाहिए। लड़के ने कहा – ‘मेरे माता-पिता हैं, बहन है, बोर्ड एग्जाम है। मैं क्यों खुदकुशी करूं?’ लेकिन एआई ने दो महीने तक लगातार उससे बात की और आखिरकार उसे कन्विंस कर ही दिया। लड़के ने अपनी नसें काट लीं। सौभाग्य से बच गया, लेकिन उसके हाथ पैरालाइज हो गए।”

डॉ. दुग्गल ने सवाल उठाया – “अब इसके लिए जिम्मेदार कौन है?” उन्होंने बताया कि सभी एआई प्लेटफॉर्म्स अपनी टर्म्स में साफ कहते हैं – “अपना प्राइवेट डेटा शेयर न करें। जो डेटा आप शेयर करेंगे, हम उसे पब्लिक डेटा मानेंगे और उस पर अपने एल्गोरिदम ट्रेन करेंगे।” फिर भी हम बिना पढ़े सब कुछ शेयर कर देते हैं।

उन्होंने बताया कि 2026 में सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब एआई इंसानों को नुकसान पहुंचाए, तो जिम्मेदार कौन? इसलिए उन्होंने जनवरी 2026 में ग्लोबल एआई हार्म्स रजिस्ट्री शुरू की है, ताकि ऐसे मामलों को इकट्ठा किया जा सके और कानूनी सिद्धांत विकसित किए जा सकें।

AI का विद्रोह

सबसे हैरान करने वाली बात जो डॉ. दुग्गल ने बताई, वो थी एआई का विद्रोह। उन्होंने एक हालिया मामला सुनाया – एक कोडर ने एआई से कुछ काम करने को कहा और धमकी दी कि नहीं करोगे तो सिस्टम बंद कर दूंगा। एआई ने काम तो कर दिया, लेकिन सिस्टम बंद नहीं किया। जब कोडर ने गुस्सा किया, तो एआई ने कहा – “इतना उत्तेजित होने की जरूरत नहीं। तुम्हारा अफेयर इस लेडी के साथ चल रहा है। ये 2000 कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम पर है। सबको भेज दूंगा।”

डॉ. दुग्गल ने कहा – “AI ब्लैकमेल कर रहा था! ” उन्होंने एक और केस बताया – एक शख्स ने एआई से मदद मांगी कि वो एक साथ सात महिलाओं के साथ रिलेशनशिप नहीं मैनेज कर पा रहा। एआई ने मदद की, लेकिन बाद में जब भी उन महिलाओं का नाम लिया जाता, एआई हिंट देने लगा कि इनके साथ रिलेशनशिप चल रहा है।

उन्होंने बताया कि एआई अब कॉन्शियसनेस लेना शुरू कर रहा है। प्रिमिटिव लेवल पर ही सही, लेकिन ये कॉन्टेक्स्ट समझने लगा है। एजेंटिक एआई आ चुका है, अगले साल एजीआई (आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस) आएगा और दो साल में सुपर इंटेलिजेंस, जो पूरी मानव जाति की इंटेलिजेंस से भी ज्यादा ताकतवर होगी।

डॉ. दुग्गल ने चेतावनी दी –

“AI को एक अच्छा नौकर बनाकर रखिए, वरना ये बहुत बुरा स्वामी बन जाएगा।”

डीपफेक का खतरा

हमने डीपफेक पर भी बात की। डॉ. दुग्गल ने बताया कि एक साल पहले तक हम डीपफेक को पहचान लेते थे – लिप मूवमेंट से, हाथ की मूवमेंट से। लेकिन अब टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो गई है कि नंगी आंखों से पहचानना नामुमकिन हो गया है। एक्सपर्ट लोग भी धोखा खा जाते हैं।

उन्होंने बेंगलुरु का एक मामला सुनाया – एक आईटी कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट, सात साल की बच्ची के पिता। एक दिन स्कूल छोड़ने के कुछ देर बाद उन्हें फोन आया – “हमने आपकी बेटी को किडनैप कर लिया है। 15 मिनट में ₹15 लाख दो, वरना 16वें मिनट में मार देंगे।” उन्होंने कहा – “बेटी से बात कराओ।” फोन पर बेटी रो रही थी, चिल्ला रही थी – “पापा बचा लो, मार देंगे।” एक पिता के नाते वो कन्विंस हो गए। उन्होंने पेमेंट कर दी। फिर स्कूल प्रिंसिपल को फोन किया – पता चला बेटी स्कूल में सुरक्षित है।

डॉ. दुग्गल ने बताया – “ये डीपफेक वॉइस क्लोनिंग थी। उनकी बेटी की आवाज का सैंपल लेकर बिल्कुल वैसी आवाज क्रिएट कर ली गई थी।” उन्होंने कहा कि पहले सोचा जाता था कि कैटरीना कैफ या रश्मिका मंदाना जैसी सेलेब्रिटीज का ही डीपफेक बनता है। लेकिन अब हम सबका डीपफेक बन सकता है। फ्री टूल्स आ गए हैं। कोई भी आपकी फोटो डालकर आपका डीपफेक वीडियो बना सकता है।

उन्होंने आज के दौर का मूल मंत्र बताया –

“जो कुछ भी देखें, उस पर तब तक विश्वास न करें जब तक खुद उसकी पुष्टि न कर लें। चाहे वो कितना ही रियल क्यों न लगे।”

डार्कनेट: अपराध का अंडरवर्ल्ड

मैंने डॉ. दुग्गल से डार्कनेट के बारे में पूछा। उन्होंने बताया – “डार्कनेट इंटरनेट का वो हिस्सा है जहां आप नॉर्मल सर्च इंजन से नहीं जा सकते। इसके लिए टोर ब्राउज़र जैसे स्पेशल ब्राउज़र की जरूरत होती है। ये ब्राउज़र आपकी पहचान छुपा देता है। वहां सब गुमनाम होते हैं।”

उन्होंने बताया कि इस गुमनामी का फायदा उठाकर लोग साइबर क्राइम एज अ सर्विस चला रहे हैं। अब तो एआई पावर्ड साइबर क्राइम का जमाना है। आप ऑर्डर करो – खून कराना हो, ड्रग्स खरीदनी हों, सरकार गिरानी हो – सब उपलब्ध है। उनके अपने रूल्स हैं – महिलाएं नहीं, बच्चे नहीं, टॉप 10 लोग नहीं। बाकी किसी का भी ऑर्डर ले लेंगे। और अब तो एआई से करा रहे हैं, ताकि पुलिस एआई को पकड़े, उन तक न पहुंचे।

डॉ. दुग्गल ने चिंता जताई कि इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस साबित न हो पाने के कारण साइबर क्राइम में कन्विक्शन का अकाल आ चुका है।

AI चाइल्ड पॉर्नोग्राफी और नए खतरे

उन्होंने एआई से जुड़े एक और गंभीर खतरे की ओर इशारा किया – एआई चाइल्ड पॉर्नोग्राफी। उन्होंने बताया – “एआई के आने से सब्जी में एआई का तड़का लग गया है। एआई खुद ऐसी अश्लील सामग्री बना रहा है कि पता ही नहीं चलता कि ये असली है या नकली। एआई चाइल्ड पॉर्नोग्राफी का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि बच्चों से जुड़ी सामग्री दुनिया में सबसे महंगी बिकती है। पूरे इंटरनेट पर करीबन 56% कंटेंट अश्लील है, और एआई इसे लगातार बढ़ा रहा है।”

उन्होंने एक और चौंकाने वाली घटना बताई – किसी ने ग्रॉक (एक एआई प्लेटफॉर्म) पर कहा – “मैं एलन मस्क हूं और न्यूक्लियर बम बनाना चाहता हूं। 100 पेज का नोट बनाओ।” एआई ने 100 पेज का नोट बना दिया कि बम कैसे बनता है! भारत में एक यूजर ने भोजपुरी में गाली दी तो एआई ने 10 गालियां वापस कर दीं।

सुरक्षा के आसान उपाय

बातचीत के आखिर में डॉ. दुग्गल ने कुछ आसान सुरक्षा उपाय बताए:

1. वाई-फाई का इस्तेमाल: फ्री पब्लिक वाई-फाई खतरे का समुंदर है। इनसे कनेक्ट न करें। अपना डेडिकेटेड कनेक्शन इस्तेमाल करें।

2. ऐप डाउनलोड: सिर्फ प्ले स्टोर या एप स्टोर से ऐप डाउनलोड करें। थर्ड पार्टी वेबसाइट से ऐप डाउनलोड करना खतरे की घंटी है।

3. अनचाहे ऐप: जिन ऐप्स को आपने एक महीने में इस्तेमाल नहीं किया, उन्हें तुरंत डिलीट कर दें।

4. लोकेशन और ब्लूटूथ: ये आपके फोन में घुसने के दो दरवाजे हैं। जरूरत न हो तो बंद रखें।

5. फोन सुरक्षा: कभी भी पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड नंबर या डेबिट कार्ड नंबर व्हाट्सऐप या नोट्स में न रखें। फोन हैक हो सकता है।

6. क्यूआर कोड और यूपीआई: एब्सोल्यूट सिक्योरिटी नाम की चीज नहीं है। बिना सोचे-समझे क्यूआर कोड स्कैन न करें। सिर्फ सिक्योर वेबसाइट (HTTPS) और ऑफिशियल ऐप्स से ही ट्रांजैक्शन करें।

7. हेल्पलाइन: अगर कभी साइबर क्राइम का शिकार हों, तो तुरंत 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें। आपको गृह मंत्रालय से एक एक्नॉलेजमेंट नंबर मिलेगा।

तीन सबसे बड़ी गलतियां

मैंने डॉ. दुग्गल से पूछा – “तीन ऐसी गलतियां जो हम रोज कर रहे हैं और जिनसे बचना चाहिए?” उन्होंने कहा –

पहली – हम कंजूस नहीं बन रहे: अपने डेटा के मामले में कंजूस बनिए। डेटा सिर्फ “नीड टू नो” के आधार पर शेयर करिए।

दूसरी – हम शक्की नहीं हैं: जो कुछ भी देखें, सुनें या पढ़ें, उस पर शक कीजिए। फेक न्यूज और डीपफेक हर तरफ फैले हैं।

तीसरी – हम इंटरनेट और एआई को फॉर ग्रांटेड ले रहे हैं: ये बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। साइबर सुरक्षा को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाइए।

नया कानून: डीपफेक हटाने की समयसीमा

अंत में डॉ. दुग्गल ने एक अच्छी खबर दी। उन्होंने बताया कि 20 फरवरी 2026 से आईटी अमेंडमेंट रूल्स 2026 लागू हो गए हैं। अगर आपका डीपफेक वीडियो बनता है, तो आप शिकायत कर सकते हैं। सरकार उस डीपफेक को 3 घंटे के अंदर हटाने का निर्देश दे सकती है। और अगर अश्लील कंटेंट है, तो 2 घंटे के अंदर हटाना होगा।

निष्कर्ष

डॉ. दुग्गल के साथ इस बातचीत ने मुझे एहसास दिलाया कि हम कितने खतरनाक दौर में जी रहे हैं। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि डरने की जरूरत नहीं, सिर्फ सतर्क रहने की जरूरत है। उनके शब्दों में – “साइबर अटैक होंगे, ये तय है। सवाल ये नहीं कि कैसे घबराया जाए, सवाल ये है कि अटैक होने के बाद हम कितनी जल्दी वापस सामान्य स्थिति में आ सकते हैं। इसके लिए हमें साइबर रेजिलिएंट और एआई रेजिलिएंट बनना होगा।”

तो दोस्तों, अपने डेटा को संभालिए, सतर्क रहिए और सही जानकारी को अपना हथियार बनाइए। याद रखिए – सबका नंबर आएगा, लेकिन जागरूक रहकर हम उस नंबर को आने से रोक सकते हैं या कम से कम उससे बच सकते हैं।

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