एक आवाज जिसने कहा था “अंधेरा कायम रहे” और एक चेहरा जिसने करोड़ों दिलों में गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा को स्थापित कर दिया। यह कहानी है सुरेंद्र पाल सिंह की, जिन्होंने देव को भी जिया और दानव को भी।
The Arvindams Podcast पर श्री अरविंद योगराज से बातचीत में सुरेंद्र पाल जी ने अपने संघर्ष, अपनी असफलताओं, उस ऐतिहासिक सफलता और अपनी निजी जिंदगी के अनछुए पहलुओं पर ऐसा प्रकाश डाला कि हर दर्शक भावुक हो उठा।
यह महज एक इंटरव्यू नहीं था, बल्कि भारतीय टेलीविजन के उस स्वर्णिम युग की यात्रा थी, जब सड़कें सूनी हो जाती थीं, गलियों में महाभारत और रामायण की गूंज होती थी और एक्टर असली जीवन में ‘भगवान’ बन जाते थे।
“मैं हीरो बनने आया था, बूढ़े का रोल दें दिया”
बातचीत की शुरुआत में अरविंद योगराज ने 80 के दशक के उस दौर को याद किया, जब एंटरटेनमेंट का एकमात्र साधन दूरदर्शन हुआ करता था। इस पर सुरेंद्र पाल जी ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि महाभारत के निर्माण की घोषणा के बाद लोगों का रिएक्शन बेहद नकारात्मक था।
“लोग कहते थे – ‘महाभारत में काम कर रहे हो? इतने सारे किरदार हैं, कौन किसका बेटा है, कौन किसका बाप है? ये कंफ्यूजन वाला सीरियल है, कोई नहीं देखेगा।’ हम खुद स्ट्रगलिंग आर्टिस्ट थे, बॉम्बे में सर्वाइवल मुश्किल था। सपना हीरो बनने का था, लेकिन एक बूढ़े का रोल मिल रहा था, सोचा – चलो, यही सही, गाजियाबाद वापस तो जाना ही है।”
लेकिन सबसे बड़ा नाटक तो तब हुआ जब उन्होंने यह रोल करने से ही मना कर दिया। एक युवा, हैंडसम और टाइगर जैसी आंखों वाले कलाकार को गुरु द्रोणाचार्य का रोल समझ से परे था। उन्हें लगता था कि उन्हें अर्जुन या कर्ण जैसा रोल मिलना चाहिए।
बी.आर. चोपड़ा की वो तीखी नजर और राही मासूम रजा का वो डांट
सुरेंद्र पाल जी ने उस ऐतिहासिक पल को फिर से जीवंत कर दिया, जब वो रोल बदलवाने की उम्मीद में बी.आर. चोपड़ा साहब के पास पहुंचे। उनकी उम्मीदों के विपरीत, चोपड़ा साहब ने उन्हें देखकर कहा – “ये देखो, मेरा द्रोणाचार्य खड़ा है!”
लेखक डॉ. राही मासूम रज़ा का गुस्सा तो देखते ही बनता था। सुरेंद्र पाल जी बताते हैं, “उन्होंने मुझे डांटा, ‘तुम ग्रेजुएट हो और यह नहीं जानते कि द्रोणाचार्य आर्मी का जनरल था, बूढ़ा नहीं था?’ उन्होंने मुझे गधे का बच्चा कहा। उस वक्त बहुत बुरा लगा, लेकिन आज लगता है कि वो डांट नहीं, आशीर्वाद था।”
उस डांट के बाद उन्होंने चुपचाप रोल स्वीकार कर लिया और पूरी शिद्दत से काम करना शुरू कर दिया।
जब रियल लाइफ में बन गए गुरु द्रोणाचार्य
और फिर वही हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। महाभारत ने इतिहास रच दिया। सुरेंद्र पाल सिंह के लिए जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उन्होंने एक दिल छू लेने वाला किस्सा सुनाया, जब वो राशन लेने एक दुकान पर गए।
“मेरे पास पैसे नहीं थे। मैंने कहा एक किलो आटा दे दो। दुकानदार बोला, ‘सरकार, क्या भिजवा दूं आपके घर? पैसे कौन मांग रहा है, आप दुकान पर आ गए, यही बड़ी बात है। अरे सुन भाई, इनका पूरा सामान बांध दो, 5 किलो आटा बांध दो।’ उसने कहा, ‘द्रोणाचार्य जी के घर भेज रहे हैं, यही हमारा भाग्य है।'”
एकलव्य का अंगूठा: क्या आज गुरु द्रोण वैसा ही करते?
इस पॉडकास्ट की सबसे दिलचस्प बहस एकलव्य प्रकरण पर हुई। जब अरविंद ने पूछा कि क्या आज गुरु द्रोण किसी एकलव्य का अंगूठा मांग लेंगे, तो सुरेंद्र पाल जी ने विस्तार से समझाया।
उन्होंने कहा कि महाभारत के कई वर्जन हैं, लेकिन वो मूल कथा को ही मानते हैं। उनके अनुसार, द्रोणाचार्य ने अर्जुन को श्रेष्ठ बनाने के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा चुराने का दंड देने के लिए अंगूठा मांगा था। यह बहस इस बात पर भी पहुंची कि आज के समय में भी गुरु का होना कितना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय; बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दियो बताय।”
शक्तिमान का किलविश: वो 2 घंटे का मेकअप और अमिताभ बच्चन का विग
बातचीत का एक और भावुक पड़ाव था – ‘शक्तिमान’ का खलनायक ‘किलविश’। यह किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि बच्चे उसके डायलॉग ‘अंधेरा कायम रहे’ की नकल करने लगे। सुरेंद्र पाल जी ने बताया कि यह किरदार उनके लिए 10 सीरियल के बराबर भारी था।
मेकअप में 2 घंटे लगते थे। सफेद मेकअप, नकली दांत, लंबे-लंबे नाखून जो फेवीकोल से चिपकाए जाते थे। पेशाब करना हो तो जिप खोलना मुश्किल हो जाता था। 10 किलो की पैडिंग, बॉम्बे की गर्मी, और ऊपर से वो मेकअप खा जाना – यह सब बहुत कष्टदायक था।
उन्होंने एक राज़ खोला कि किलविश के लंबे बाल असल में अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘खुदा गवाह’ का विग थे, जिसे उन्होंने प्रोडक्शन हाउस से ले लिया था।
मुंबई के सितारे और सादगी की मिसाल
दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने धर्मेंद्र को अपना भगवान बताया और शत्रुघ्न सिन्हा के बारे में एक दिल को छू लेने वाला किस्सा सुनाया।
“मैं सड़क पर पैदल जा रहा था। शत्रुघ्न सिन्हा जी अपनी मर्सिडीज़ से गुजर रहे थे। उन्होंने मुझे देखा, गाड़ी रोकी और मुझे बैठा लिया। मुझे दूसरों से मिलवाया और कहा, ‘यार, इस लड़के को अपनी पिक्चर में काम दे दो।’ उस वक्त वो बड़े स्टार थे, और मैं सड़क पर चलने वाला एक स्ट्रगलर।”
परिवार, संस्कार और संदेश
अपने बड़े परिवार (11 भाई-बहन) को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ईश्वर उनके लिए माता-पिता के रूप में ही प्रकट हुए। उनका संदेश साफ था कि माता-पिता को अनाथ आश्रम में मत छोड़ो, उनसे बात करो, उनका हाथ पकड़ो।
नई पीढ़ी को सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि यह इंडस्ट्री प्योर टैलेंट की भूखी है। यहां सिफारिश नहीं, योग्यता चलती है। अंत में उन्होंने अपनी मां की सीख दोहराई, “बेटा, अगर धतूरा बोओगे तो धतूरा ही निकलेगा, और गेहूं बोओगे तो गेहूं ही।”
यह इंटरव्यू सिर्फ एक अभिनेता की जीवनी नहीं है, बल्कि उस तपस्या, संघर्ष और संस्कार की कहानी है, जिसने भारतीय टेलीविजन के इतिहास को आकार दिया। सुरेंद्र पाल सिंह आज भी उसी जुनून के साथ प्रभास की फिल्म ‘स्पिरिट’ और ‘जय जगन्नाथ’ जैसे प्रोजेक्ट्स में व्यस्त हैं, और साबित कर रहे हैं कि असली कलाकार कभी रिटायर नहीं होता।


