DGP Vikram singh at the arvindams podcast

जब वर्दी ने माफिया की गर्दन पर रखा पैर: पूर्व डीजीपी डॉ. विक्रम सिंह की जुबानी

उत्तर प्रदेश का वो दौर जब सड़कों पर कानून का नाम लेने से पहले लोग दहशत के साये में जीते थे, जब थानों पर डकैतों के गैंग धावा बोल देते थे और पुलिस अफसरों को सलाह दी जाती थी कि वे अपने घरों की नेमप्लेट और गाड़ियों से ‘पुलिस’ का कलर हटा दें, वरना शादी-ब्याह में पहचाने जाने पर उनकी हत्या हो सकती है। इसी भयावह माहौल में एक शख्स ऐसा भी था जिसने न केवल इस डर को चुनौती दी बल्कि माफिया के सामने झुकने के बजाय उनकी खाल उतारने का माद्दा रखा।

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और 1974 बैच के आईपीएस अधिकारी डॉ. विक्रम सिंह की, जिन्होंने 36 वर्षों के अपने सेवाकाल में न भूतो न भविष्यति जैसी सख्ती से अपराध और राजनीतिक दबाव का सामना किया। हाल ही में एक विस्तृत बातचीत में विक्रम सिंह ने अपने संघर्षों, सत्ता के गलियारों में हुई भिड़ंतों और यूपी में माफिया राज के अंत की अनदेखी तस्वीरों को बेबाकी से बयां किया।

डॉ. विक्रम सिंह के करियर की शुरुआत ही ऐसे माहौल में हुई जहां पुलिसिंग का मतलब दोयम दर्जे की जिंदगी जीना माना जाता था। वह बताते हैं कि सितंबर 1981 में जनपद एटा के थाना अलीगंज में छविराम गैंग ने सामने से गोलियां चलाने के बजाय पीछे से घेरकर पूरे थाने को शहीद कर दिया था। उस वक्त पुलिस का मनोबल इतना टूट चुका था कि अफसरों को अपनी पहचान छुपाने की सलाह दी जाती थी। विक्रम सिंह कहते हैं, “लानत है ऐसे जिंदा रहने पर। गाड़ी में वो भी रहेगा, मैं भी रहूंगा, लेकिन पुलिस कलर नहीं हटेगा।” यही जिद उन्हें चंबल के बीहड़ों में माधव सिंह, मोहर सिंह, तहसीलदार सिंह और फूलन देवी जैसे खूंखार डकैतों से लोहा लेने के लिए खींच ले गई। उस दौर की भयावहता का जिक्र करते हुए उनकी आंखें आज भी उस मंजर को महसूस करती हैं जब वे अपने साथियों की लाशें उठाकर लाते थे। वे बताते हैं कि कई बार कोंबिंग ऑपरेशन में हफ्तों जंगल में बिना नहाए और दाढ़ी बनाए गुजरते थे, जिसके बाद जब वे घर लौटते थे तो परिवार वाले भी उन्हें भूत-प्रेत समझकर पहचानने से इनकार कर देते थे। विक्रम सिंह का कहना है कि तब के डकैत पुलिस से एक कदम आगे चलते थे, उनके पास AK-47, AK-56 और स्नाइपर राइफल्स होती थीं, जिनका स्रोत बांग्लादेश युद्ध के बाद ईस्ट पाकिस्तान से लूटे गए हथियार और नेपाल की छिद्रिल सीमा थी। उस दौर में अपराधियों के पास इतना धनबल था कि जब फिएट और एंबेसडर गाड़ियों के दाम हजारों में हुआ करते थे, तब ये डकैत स्नाइपर राइफल के लिए 5 से 10 लाख रुपये तक चुकाने को तैयार रहते थे।

हालांकि, असली जंग उन्हें तब लड़नी पड़ी जब वर्दी की चुनौती सिर्फ जंगल के डकैतों से नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त शहरी माफिया और सत्ता के गलियारों में बैठे उनके आकाओं से हुई। विक्रम सिंह ने बिना किसी लाग-लपेट के उस दौर का जिक्र किया जब मुख्यमंत्री आवास से उन्हें विशेष रूप से बुलाकर एक शातिर अपराधी के साथ बैठाया गया। वह बताते हैं कि उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री से साफ कह दिया, “ये आपके खास हैं तो अपनी गोद में बिठाइए, लेकिन अगर सेवा का मौका मिला तो मेरा एक उसूल है—मैं उधार में कोई चीज नहीं रखता। वक्त से पहले और उम्मीद से ज्यादा, मूल और सूद समेत ऐसा हिसाब चुकाऊंगा कि ये लोग याद रखेंगे।” इस बेबाकी का नतीजा यह हुआ कि जब उस अपराधी ने दोबारा डकैती डाली तो मुठभेड़ में उसके सिर में गोली लगी और हालांकि वह उस हमले में बच गया, लेकिन विक्रम सिंह ने पीछे हटने के बजाय कानूनी लड़ाई जारी रखी। उस माफिया ने जब विक्रम सिंह के डीजीपी बनने के बाद उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट तक जारी करवा दिया तो विक्रम सिंह का जवाब था, “जो कानून और विचारों से कमजोर होते हैं, वे डरते हैं। मैं न कानून में कमजोर हूं, न विचारों में। वारंट उसी के खिलाफ निकलेगा।” और वाकई वह माफिया का गैंग पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गया।

पूर्व डीजीपी ने वर्तमान उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था की तुलना बीते युग से करते हुए एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि जघन्य अपराधों में 85 प्रतिशत तक की कमी आई है और फिरौती के लिए अपहरण जैसी घटनाएं लगभग खत्म हो गई हैं। वह मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली की तारीफ करते हुए कहते हैं कि पिछले शासनों में मुख्यमंत्री से साल में एक-दो बार मुलाकात होती थी, लेकिन योगी जी को यूपी के थानों और जिलों की उतनी जानकारी है जितनी शायद वहां के एसपी को भी नहीं होगी। उन्होंने माफिया पर सख्ती को लेकर उठने वाले सांप्रदायिक सवालों पर भी करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा, “आप कहते हैं कि हम अतीक और मुख्तार की बात करते हैं, धनंजय या बृजेश की नहीं। मैं उसकी बात करूंगा जो क्रियाशील है। जो 10 साल से साइलेंट है, उसका उपचार दूसरा है और जो क्रियाशील है उसका उपचार दूसरा। ट्रीटमेंट का स्तर होम्योपैथिक से लेकर च्यवनप्राश और बाईपास सर्जरी तक अलग-अलग होता है।” उन्होंने अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे माफियाओं को किसी समुदाय का ब्रांड एंबेसडर मानने वालों पर तंज कसते हुए कहा कि असली ब्रांड एंबेसडर तो एपीजे अब्दुल कलाम, बिस्मिल्लाह खान और शहीद अशफाक उल्लाह खान हैं, “आप चोटों को क्यों छाती से लगाते हैं, उनकी सैंडल सिर पर लेकर क्यों घूम रहे हैं?”

बातचीत के दौरान जब हाल ही में विवादों में रही फिल्म ‘धुरंधर’ और अतीक अहमद के आईएसआई कनेक्शन का जिक्र आया तो विक्रम सिंह ने खुलासा किया कि फिल्म भले ही अभी आई हो, लेकिन अतीक की गिरफ्तारी के बाद उसके घर से ‘मेड इन पाकिस्तान’ कारतूस और पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के हथियार बरामद हुए थे। उन्होंने कहा, “एक से एक अच्छी शस्त्रों की दुकानें यहां हैं, लेकिन पाकिस्तान के हराम के कारतूस चलाने का जो लुत्फ है, वो इंडियन ऑर्डिनेंस में कहां। ये माइंडसेट होता है। जिस तरह लोग लखनऊ की बिरयानी छोड़ लाहौर की निहारी का इंतजार करते हैं, ठीक वैसे ही ये अपराधी पाकिस्तानी हथियारों के दीवाने थे।” उन्होंने बताया कि अतीक ने स्वयं थाना शाहगंज में अपने बयान में आईएसआई से संबंध और ड्रोन के जरिए हथियार आने की बात स्वीकार की थी।

36 साल के करियर में कई ऐसे ऑपरेशन हुए जो ‘बॉर्डर लाइन’ पर थे और जहां व्यवहारिक निर्णय लेने पड़े। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे एक मुठभेड़ के दौरान मुख्य गैंगस्टर को भागने से रोकने के लिए उनके घायल साथी को छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता था और न ही उसे अस्पताल भेजने के संसाधन थे। उस स्थिति में लिया गया निर्णय कानून की परिधि में न्यूनतम और आवश्यक बल प्रयोग का हिस्सा था। उन्होंने कहा, “पुलिस ऑपरेशन और एनकाउंटर एक तपस्या है, कैजुअल नहीं। यहां बैकअप का बैकअप होना चाहिए।” डॉ. विक्रम सिंह आज भी बेबाक हैं कि भले ही सड़कों से खुलेआम घूमने वाला माफिया कल्चर खत्म हो गया है, लेकिन माफिया ने अपना रूप बदल लिया है। टीसीएस जैसी कंपनियों में सेंध या चुनावी बूथ कैप्चरिंग जैसे अपराध आज के नए माफिया टूल्स हैं। उनका मानना है कि युवा अधिकारियों को फिल्मी ‘दबंग’ हीरो नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन के सत्यनिष्ठ अधिकारियों को आदर्श मानना चाहिए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि राजनीतिक संरक्षण का वो पुराना इकोसिस्टम अब खत्म हो चुका है और अगर कोई दोबारा आंख उठाने की कोशिश करेगा तो उसका हश्र विकास दुबे जैसा होगा—”जैसे सिगरेट का बट फुझाया जाता है, वही दुर्गति होगी।”

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