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कैसे Dr. Subramanian Swamy इंडियन पॉलिटिक्स के पटल पर छा गए

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे चेहरे हैं जो सिर्फ़ राजनेता नहीं होते, बल्कि वे किसी आंदोलन, विचारधारा और अटूट संकल्प की पहचान बन जाते हैं। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ऐसे ही लोगों में सबसे आगे हैं—एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने दिल्ली की सत्ता के गलियारों में कदम रखने और बड़े-बड़े नेताओं की नींद उड़ाने से पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान में अर्थशास्त्र पढ़ाया था।

87 साल की उम्र में भी स्वामी का तेवर वैसा ही जोशीला है जैसा 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के खिलाफ़ दिखा था। वे न तो किसी से डरते हैं और न ही किसी को बख्शते हैं; चाहे मोदी हों, राहुल गांधी हों या सोनिया गांधी—जब भी मौका मिला, उन्होंने हमला करने में कभी संकोच नहीं किया।

तो फिर, यह व्यक्ति भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा “रिबेलियन” कैसे बन गया? आइए, उनके शानदार—और अक्सर विवादों से भरे—सफ़र पर एक नज़र डालते हैं।

एक प्रोफेसर जिसने ‘सिस्टम’ से बगावत की

स्वामी जी की कहानी आम नेताओं जैसी नहीं है। वो कोई चाय बेचने वाले नहीं थे और न ही किसी बड़े राजनीतिक परिवार से आए थे। वो तो एक शुद्ध ‘एकेडमिक’ थे। हार्वर्ड में पढ़ाना किसी भी इंसान के लिए सपने जैसा होता है, लेकिन स्वामी जी के मन में तो शुरू से देश के लिए कुछ करने की आग थी।

उन्होंने अमेरिका की आरामदायक जिंदगी को ठोकर मार दी। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता था कि भारत में वामपंथी विचारधारा (Leftism) और कम्युनिज्म देश को बर्बाद कर रही है। वो अर्थशास्त्र में फ्री एंटरप्राइज और लोगों की भागीदारी में विश्वास रखते थे। जब वो इंडिया आकर IIT दिल्ली में पढ़ाने लगे, तो उन्होंने वहां भी कम्युनिज्म की खूब खबर ली। ये बात उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को नागवार गुजरी और उन्होंने स्वामी जी को IIT से निकाल दिया। यहीं से उनकी राजनीतिक जिंदगी की नींव पड़ी। जनसंघ के लोगों ने उन्हें हाथ पकड़ा, क्योंकि उनकी विचारधारा जनसंघ से मेल खाती थी।

इंदिरा गांधी को ‘घबराने’ वाला आदमी

स्वामी जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी निडरता है। जब वो पार्लियामेंट पहुंचे, तो उन्होंने इंदिरा गांधी की हालत खराब कर दी। वो इतने आक्रामक थे कि इंदिरा गांधी उनसे घबरा जाती थीं। जब 1975 में आपातकाल (Emergency) लगा, तो स्वामी जी के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हुआ। लेकिन स्वामी जी तो स्वामी जी हैं।

उन्होंने एक ऐसा प्लान बनाया जो किसी जासूसी फिल्म से कम नहीं है। वो अमेरिका से फ्लाइट पकड़कर चुपचाप दिल्ली पहुंचे। उन्होंने बैंकॉक का टिकट खरीदा था ताकि कोई उन्हें ट्रैक न कर सके। दिल्ली एयरपोर्ट से वो सीधे पार्लियामेंट पहुंचे, कांग्रेस के सामने भाषण दिया और फिर वहां से निकलकर बिरला मंदिर के पास अपनी कार बदली, भेष बदला, कांग्रेस की टोपी पहनी और ट्रेन से बॉम्बे भाग गए। वहां से नेपाल होते हुए वापस अमेरिका। इस घटना ने उन्हें एक ‘बाहुबली’ नेता के रूप में स्थापित कर दिया।

दोस्ती और दुश्मनी का अनोखा संगम

स्वामी जी की पॉलिटिक्स में दोस्ती और दुश्मनी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वो जनसंघ और BJP में रहे, लेकिन पार्टी के अंदर ही उनके सबसे बड़े विरोधी थे। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनके रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे। स्वामी जी ने खुले मंच से कहा कि वाजपेयी जी के भाषण तो बहुत अच्छे होते थे, लेकिन वो स्वामी जी की लोकप्रियता से जलते थे और पार्टी के अंदर उन्हें हमेशा साइड में करने की कोशिश की।

उसी समय, जो इंसान उनका कट्टर राजनीतिक दुश्मन था, राजीव गांधी, उससे उनकी गहरी पर्सनल दोस्ती हो गई। राजीव गांधी ने खुद कहा था कि स्वामी जी के एक्शन की वजह से उनकी मां इंदिरा गांधी को इलेक्शन कराने पड़े। स्वामी जी आज भी मानते हैं कि राजीव गांधी एक अच्छे इंसान थे, और अगर उन्हें सही सलाह मिलती तो वो अच्छे PM साबित हो सकते थे। लेकिन सोनिया गांधी के लिए उनके मन में जरा भी सम्मान नहीं है।

आज के दौर में स्वामी का महत्व (मोदी विरोध और अर्थव्यवस्था)

आज के दौर में स्वामी जी ने सबसे ज्यादा सुर्खियां नरेंद्र मोदी के विरोध की वजह से बटोरी हैं। वो बताते हैं कि एक समय था जब मोदी एक साधारण RSS प्रचारक थे और गुजरात में खुद गाड़ी चलाकर स्वामी जी को लेने आते थे। लेकिन आज मोदी ‘घमंड’ में हैं और उनसे मिलते भी नहीं।

स्वामी जी का आरोप है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में चीन ने भारत की निर्विवादित जमीन को हड़प लिया है, और मोदी सरकार इस पर चुप्पी साधे हुए है। एक अर्थशास्त्री होने के नाते उनकी नजर देश की ग्रोथ पर है। वो कहते हैं कि भारत की ग्रोथ रेट 10% होनी चाहिए, और इसके लिए इनकम टैक्स को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहिए। उनका मानना है कि निर्मला सीतारमण को अर्थशास्त्र की ‘क’ नहीं आती।

निष्कर्ष: बेबाकी ही उनकी पहचान है

डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी हमेशा से सिस्टम को चैलेंज करते रहे हैं। उन्होंने कभी कुर्सी के लिए समझौता नहीं किया। उनका सबसे बड़ा हथियार उनकी पढ़ाई (हार्वर्ड की डिग्री), उनका कानूनी ज्ञान और उनकी बेबाक जुबान है।

चाहे राम मंदिर की लड़ाई हो, नेशनल हेराल्ड केस हो, या फिर चीन की घुसपैठ का मुद्दा, स्वामी जी ने हमेशा ऐसे मुद्दों को उठाया है जिन्हें उठाने की हिम्मत दूसरों में नहीं होती। वो भले ही आज सक्रिय राजनीति से दूर हों, लेकिन उनकी आवाज आज भी सत्ता के गलियारों में खौफ पैदा करती है।

यही वजह है कि Dr. Subramanian Swamy इंडियन पॉलिटिक्स के पटल पर हमेशा के लिए छा गए हैं। जय हिन्द!


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