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सेक्स, सच और समाज का पाखंड: डॉ. अमित जोशी के साथ एक बातचीत

क्यों हर तीसरा भारतीय पुरुष यौन समस्या से ग्रसित है, लेकिन डॉक्टर के पास जाने में शर्माता है?

हम उस विषय पर बात करने जा रहे हैं, जिससे हर कोई गुजरता है, लेकिन कोई बात नहीं करता।

जिस चीज को कुदरत ने सबसे खूबसूरती से बनाया, उसे हमने अपनी सोच से ‘गंदगी’ और ‘गुनाह’ तक का नाम दे दिया है। यह विडंबना ही है कि जिस अंग और प्रक्रिया से पूरी मानव जाति का अस्तित्व जुड़ा है, उसे लेकर हमारे समाज में आज भी झिझक, शर्म और भ्रांतियों का अंधेरा छाया हुआ है।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर तीसरा पुरुष किसी न किसी यौन समस्या से जूझ रहा है, लेकिन उनमें से अधिकतर डॉक्टर के पास जाने की बजाय नीम-हकीमों के चक्कर में या गूगल पर ढूंढे गए खतरनाक नुस्खों के भरोसे अपनी जिंदगी और सेहत को जोखिम में डाल देते हैं।

आखिर ऐसा क्यों है? क्यों हम अपने पूर्वजों की तरह इस विषय पर खुलकर बात नहीं कर पाते, जिन्होंने कामसूत्र जैसे विस्तृत ग्रंथ लिखे और कोणार्क, खजुराहो जैसे मंदिरों में सेक्स को कला और जीवन के उत्सव के रूप में स्थापित किया?

इसी सोच पर से पर्दा हटाने और यौन स्वास्थ्य से जुड़े जटिल सवालों के वैज्ञानिक जवाब देने के लिए हमने बात की वरिष्ठ फिजिशियन और सेक्सोलॉजिस्ट, डॉ. अमित जोशी से। पेश हैं उनके अनुभव और ज्ञान के कुछ अंश।

‘गुप्त रोग’ नहीं, ‘प्रिय अंग’ है

हमारे समाज में सेक्स से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या है उसे ‘गुप्त’ रखने की मानसिकता।

डॉ. जोशी कहते हैं, “यह गुप्त नहीं है। सदियों से इस पर काम हुआ है। पूरी दुनिया का रिप्रोडक्शन इसी से हो रहा है।” वह इसे हमारे शरीर का सबसे कीमती अंग बताते हैं, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे साथ रहता है। उनके अनुसार, जब हम दांत के दर्द में दांत के डॉक्टर के पास जाते हैं, तो सेक्स की समस्या में डॉक्टर के पास जाने में शर्म क्यों? यह शर्म इसलिए है क्योंकि हम इसे अपने शरीर का हिस्सा मानने की बजाय किसी अपराध या गलत काम से जोड़ देते हैं। यहां तक कि बड़े-बड़े नेता, अफसर और वीआईपी भी अपनी समस्या लेकर आते हैं, लेकिन नाम तक बदल लेते हैं।

इरेक्टाइल डिस्फंक्शन: शरीर का अलार्म

इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (ईडी) को अक्सर सिर्फ एक यौन समस्या समझ लिया जाता है, लेकिन डॉ. जोशी इसे भविष्य की बीमारियों का एक महत्वपूर्ण संकेत बताते हैं। उनके अनुसार, ईडी के तीन मुख्य कारण हैं: हार्मोनल असंतुलन, शारीरिक (फिजियोलॉजिकल) और मानसिक (साइकोलॉजिकल)।

सबसे अहम बात जो उन्होंने कही, वह यह कि ईडी हमारे शरीर में हो रहे ब्लॉकेज का सबसे पहला संकेत हो सकता है। हृदय की नसों का साइज़ लिंग की नसों से बड़ा होता है। अगर लिंग की छोटी नसों में ब्लॉकेज शुरू हो रहा है (जिससे ईडी होता है), तो यह एक चेतावनी है कि आने वाले वर्षों में हृदय की नसों में भी ब्लॉकेज हो सकता है, जिससे हार्ट अटैक का खतरा पैदा हो जाता है। इसलिए, ईडी को नज़रअंदाज़ करना अपने भविष्य को नज़रअंदाज़ करने जैसा है।

डायबिटीज और सेक्स: सास-बहू का रिश्ता

डायबिटीज और यौन स्वास्थ्य का गहरा संबंध है। डॉ. जोशी इसे “सास-बहू का रिश्ता” कहते हैं। डायबिटीज के मरीजों में ईडी और अन्य यौन समस्याएं बेहद आम हैं। इसके दो मुख्य कारण हैं:

  1. माइक्रोवैस्कुलर कॉम्प्लिकेशन: बढ़ी हुई शुगर लिंग की रक्त वाहिकाओं (नसों) में क्रिस्टल की तरह चिपक जाती है, जिससे वे सख्त और संकरी हो जाती हैं। इरेक्शन के लिए जरूरी रक्त प्रवाह बाधित होता है।
  2. न्यूरोपैथी: डायबिटीज नसों को भी नुकसान पहुंचाता है। दिमाग से उत्तेजना का संकेत लिंग तक नहीं पहुंच पाता।

अच्छी खबर यह है कि डायबिटीज को कंट्रोल करके इन समस्याओं को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।

जल्दी स्खलन: एक खिलाड़ी की तरह तैयारी करें

जल्दी स्खलन (प्रीमैच्योर इजैकुलेशन) की समस्या ज्यादातर अनुभवहीनता, ओवर-एक्साइटमेंट या फिर ग्लांस (लिंग के अगले हिस्से) की अधिक संवेदनशीलता के कारण होती है।

डॉ. जोशी इसका समाधान पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज में बताते हैं। उनका कहना है कि जैसे एक अच्छे बल्लेबाज को स्टैमिना की जरूरत होती है, वैसे ही सेक्स के लिए भी फिटनेस जरूरी है। पुश-अप्स, सपाटे, हनुमान दंड जैसी एक्सरसाइज पेल्विक एरिया को मजबूत बनाती हैं, जिससे स्खलन पर नियंत्रण पाने की क्षमता बढ़ती है।

अभिनेता विद्युत जामवाल द्वारा बताई गई कालारीपायट्टू (कलारी) की एक्सरसाइज को भी वे काफी कारगर मानते हैं।

पॉर्न: सीखने का जरिया या बर्बादी की वजह?

डॉ. जोशी पॉर्न को दो धारी तलवार बताते हैं। उनके अनुसार, पॉर्न का पॉजिटिव पहलू यह है कि यह सेक्स एजुकेशन का पहला जरिया हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें शरीर रचना और सेक्स के तरीकों की बुनियादी जानकारी नहीं है। लेकिन नकारात्मक पहलू यह है कि पॉर्न पूरी तरह से ‘फेक’ है। यह रियलिटी नहीं, बल्कि एंटरटेनमेंट है, जिसमें कैमरा ट्रिक्स, कट्स और इंजेक्शन का इस्तेमाल होता है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान है पॉर्न-इंड्यूस्ड इरेक्टाइल डिस्फंक्शन। जब कोई व्यक्ति पॉर्न देखने का आदी हो जाता है, तो उसका दिमाग असत्य और अतिरंजित चीजों का आदी हो जाता है।

असल जीवन में एक सामान्य साथी के साथ उसे उतनी उत्तेजना नहीं मिलती, जिससे वह सेक्स कर ही नहीं पाता। यह समस्या आजकल युवाओं में बेहद आम है और ‘अनकंज्यूमेटेड मैरिज’ (जहां शादी के बाद भी संभोग नहीं हो पाता) के मामले बढ़ रहे हैं।

महिलाओं की यौन समस्याएं और सच्चाई

महिलाओं में सबसे आम समस्या ‘लो लिबिडो’ (कामेच्छा में कमी) और ‘वैजिनिस्मस’ है। वैजिनिस्मस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें योनि की मांसपेशियां संभोग के दौरान अनायास सिकुड़ जाती हैं, जिससे दर्द होता है और संभोग असंभव हो जाता है। डॉ. जोशी बताते हैं कि इसका इलाज संभव है।

एक बड़ा मिथक यह भी है कि महिलाओं की यौन क्षमता पुरुषों से 8 गुना अधिक होती है। इसे सिरे से खारिज करते हुए डॉ. जोशी कहते हैं कि पुरुष और महिला एक ही कोशिका से बने हैं और दोनों की यौन भूख बराबर होती है। फर्क सिर्फ फिटनेस, उम्र और मानसिक स्थिति का होता है।

रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद हार्मोनल बदलाव से महिलाओं की इच्छा में कमी आ सकती है, लेकिन इसका भी समाधान है।

मास्टरबेशन, नाइट फॉल और साइज जैसे मिथक

  • मास्टरबेशन: डॉ. जोशी इसे बिल्कुल सामान्य और स्वस्थ मानव व्यवहार बताते हैं। यह तब तक ठीक है जब तक यह अत्यधिक न हो और पॉर्न एडिक्शन या रियल लाइफ से दूरी का कारण न बने। “बचपन की गलतियाँ” लिखकर इसे अपराध बताना गलत है।
  • नाइट फॉल: यह भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। जब शरीर में वीर्य बनता है और उसे बाहर निकालने का कोई रास्ता नहीं होता (न संभोग, न मास्टरबेशन), तो नींद में स्खलन होना सामान्य है। इसे लेकर डरने या शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।
  • लिंग का साइज़: पॉर्न में दिखाए जाने वाले विशाल आकार के लिंग हकीकत नहीं हैं। औसतन 5-6 इंच का साइज़ पूरी तरह से सामान्य और पर्याप्त है। डॉ. जोशी बताते हैं कि महिला की योनि का सबसे संवेदनशील हिस्सा शुरुआती 2-2.5 इंच में ही होता है। जरूरत बड़े लिंग की नहीं, बल्कि सेक्स को समझने और पार्टनर को संतुष्ट करने के कौशल की होती है।

प्रेम और समलैंगिकता

डॉ. जोशी सेक्स को केवल शारीरिक भूख मानने की बजाय प्रेम की गहरी अभिव्यक्ति मानते हैं। उनके अनुसार, सच्चा आनंद तभी मिलता है जब प्रेम और भावनाएं शामिल हों। वह समलैंगिकता को भी पूरी तरह से प्राकृतिक मानते हैं। उनका तर्क है कि यह कोई बीमारी या फैशन नहीं, बल्कि आनुवंशिक (इनबिल्ट) होती है, जैसे कोई बाएं हाथ से लिखता है। करीब 1500 प्रजातियों में समलैंगिकता पाई जाती है। इसलिए, किसी को उनकी यौन पसंद के लिए जज करना या उन्हें बदलने की कोशिश करना गलत है।

वियाग्रा और सेक्स टॉय: सावधानी से उपयोग करें

वियाग्रा और उसके जैसी दवाइयों (पीडीई5 इनहिबिटर्स) को डॉ. जोशी ‘वंडरफुल मॉलिक्यूल’ मानते हैं, लेकिन सख्त चेतावनी के साथ। ये हर किसी के लिए नहीं हैं। बिना डॉक्टरी सलाह के इन्हें लेना जानलेवा साबित हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जो दिल की बीमारी की कुछ खास दवाइयां (जैसे नाइट्रेट) ले रहे हों। वहीं, सेक्स टॉयज को वे सुरक्षित विकल्प मानते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो अकेले हैं या अपने पार्टनर से दूर हैं। यह असुरक्षित यौन संबंधों और बीमारियों से बचने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

निष्कर्ष: असली मर्दानगी है समस्या को समझना

डॉ. अमित जोशी की यह बातचीत सिर्फ एक पॉडकास्ट नहीं, बल्कि समाज के सबसे बड़े पाखंड पर एक करारा वार है। यह हमें याद दिलाती है कि असली मर्दानगी चुप रहने में नहीं, बल्कि अपनी कमियों को समझने और उन्हें दूर करने के साहस में है। यौन स्वास्थ्य हमारी संपूर्ण सेहत का एक अभिन्न अंग है। इसे नजरअंदाज करना, इस पर बात न करना, या गलत सलाह पर चलना हमें शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार कर सकता है।

जरूरत है खुलकर बात करने की, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की और डॉक्टर से सलाह लेने में झिझक को त्यागने की। जैसा कि डॉ. जोशी कहते हैं, सेक्स मैगी के नूडल की तरह दो मिनट का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रेम, फोरप्ले, आफ्टरप्ले और समझदारी से भरी एक पूरी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को समझना और सीखना ही एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन की कुंजी है।

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